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Sitare Zameen Par (2025)

फिल्म समीक्षा: सितारे ज़मीन पर (2025) – जब जज़्बात उड़ान बन जाते हैं

परिचय:
आमिर खान एक बार फिर एक संवेदनशील विषय को लेकर दर्शकों के सामने आए हैं – इस बार फ़िल्म है “सितारे ज़मीन पर”, जो 2007 में आई उनकी ब्लॉकबस्टर “तारे ज़मीन पर” की सोच को आगे बढ़ाती है। लेकिन यह फ़िल्म सीक्वल नहीं है, बल्कि एक नया दृष्टिकोण है, एक नई कहानी, नए किरदार और नई भावनाओं के साथ। यह फ़िल्म न केवल एक बच्चे की संघर्ष गाथा है, बल्कि समाज की आंखों पर चढ़े ‘काबिलियत’ के चश्मे को भी उतार फेंकती है।


कहानी की गहराई

फिल्म की कहानी वीर नाम के एक 13 वर्षीय किशोर पर आधारित है। वीर एक सीधा-सादा लेकिन कल्पनाशील बच्चा है, जो बोलने में हिचकिचाता है और पढ़ाई-लिखाई में पिछड़ा माना जाता है। स्कूल और समाज उसे “कमज़ोर”, “निकम्मा” और “नालायक” जैसे टैग देते हैं। माता-पिता भी शर्मिंदगी में उसे बोर्डिंग स्कूल भेज देते हैं।

वहीं उसकी ज़िंदगी में एक नया मोड़ तब आता है जब वह मिलता है रणविजय सर (आमिर खान) से – एक आर्ट टीचर जो बच्चों को सिर्फ नंबरों से नहीं, भावनाओं और सोच से समझते हैं। रणविजय को वीर के चित्रों में छिपी हुई कहानी दिखती है और वो धीरे-धीरे वीर को खुद पर भरोसा करना सिखाते हैं।


👨‍👩‍👦 कलाकारों का उत्कृष्ट अभिनय

  • आमिर खान ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि वह केवल अभिनेता नहीं, बल्कि समाज को जगाने वाले कलाकार हैं। रणविजय सर के रूप में उनका अभिनय बेहद संतुलित, शांत और प्रभावशाली है।

  • विशाल भाटिया, जिन्होंने वीर की भूमिका निभाई है, उन्होंने अपने चेहरे के हाव-भाव, चुप्पी, डर और मासूमियत से दर्शकों के दिल को छू लिया। यह रोल चुनौतीपूर्ण था, लेकिन उन्होंने इसे पूरे आत्मविश्वास से निभाया।

  • सपना चतुर्वेदी (वीर की मां): उन्होंने एक माँ की पीड़ा और ममता को बड़ी ईमानदारी से दर्शाया है। उनकी आंखों में जो ग्लानि और ममता दिखती है, वह कई माता-पिता को सोचने पर मजबूर कर देगी।

  • राहुल बोस ने स्कूल के सख्त मगर सोचने वाले प्रिंसिपल के रूप में अच्छा काम किया है।


🎶 संगीत और तकनीकी पक्ष

फिल्म का संगीत बेहद भावुक और कहानी के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है।

  • “उड़ चला रे सितारा”, “मैं भी खास हूँ” और “तू देख मुझे अंदर से” जैसे गानों में वह भावनात्मक गहराई है जो दर्शकों को अपने आंसू नहीं रोकने देती।

  • संगीत दिया है शंकर-एहसान-लॉय ने और बोल लिखे हैं स्वानंद किरकिरे ने, जो पहले भी “तारे ज़मीन पर” में कमाल कर चुके हैं।

सिनेमैटोग्राफी भी तारीफ के काबिल है, खासकर उन सीन्स में जहां वीर की कल्पना को रचनात्मक विज़ुअल्स में बदला गया है। स्कूल, क्लासरूम और वीर की कल्पना की दुनिया – सब कुछ जीवंत लगता है।


🧠 भावनात्मक संदेश और सामाजिक सोच

“सितारे ज़मीन पर” एक ऐसी फिल्म है जो सिर्फ मनोरंजन नहीं, एक गहरी सामाजिक सोच को भी प्रस्तुत करती है। यह फिल्म शिक्षा प्रणाली, माता-पिता की अपेक्षाएं, बच्चों की भावनात्मक ज़रूरतों और आत्म-सम्मान की खोज जैसे विषयों पर सीधी चोट करती है। फिल्म दिखाती है कि हर बच्चा यूनिक होता है, और उसकी काबिलियत को पहचानने के लिए दिल से देखने की ज़रूरत है, केवल मार्कशीट से नहीं।


🔚 निष्कर्ष:

अगर आपने “तारे ज़मीन पर” देखी है और वो आपके दिल में अब तक बसी हुई है, तो “सितारे ज़मीन पर” आपको और भी गहराई तक छू जाएगी। यह फिल्म आपको हँसाएगी, रुलाएगी और अंत में सोचने पर मजबूर कर देगी कि – “कहीं हम भी अपने आसपास किसी सितारे को नज़रअंदाज़ तो नहीं कर रहे?”

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रेटिंग: 5 में से 4.9 स्टार 🌟🌟🌟🌟✨

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